Friday, 2 December 2016

बेचैनी से ढूढ़ रहा था वो
अपना बचपन
अरसे बाद आया अपने गाँव
भाग चला पकड़ने
 पीपल को
जो करते करते इन्तजार
मर चुका था
फिर भाग कुएँ  की तरफ
जहा खेला था बचपन
चिकने पत्थरो से
शरारत ठन्डे पानी के साथ
पर वक़्त ने मूँद दिया उसे भी
अनहोनी के डर से
भागा  कच्चे रास्तो
खेतों की तरफ
जाया करता था जहा
बैलग़ाडी से
अब्बा के साथ
पर सब, सब चले गए
बस एक आस के साथ
भाग चला
अपने घर की ओर
पर ये क्या
गायब था घर
थी एक शानदार बड़ी इमारत
बैठ गया घर के आगे
सर पकड़
जैसे लुट गया सब
छोड़ गए अकेला उसे
सबसे उम्रदराज़ था वो अब यहाँ ।

कविता लिखी
एक चिड़िया की , बचपन की
यादो की,
कल की जो सुकूँ देता है
उस कल की भी जो सुकूँ देगा
अहसासों की भी जो पले बढ़े मेरे अंदर
और फिर याद आई वो
जो बनाये रखती है एक गोला सा
इन सब के बाहर
देती है चुनौती छू लेने की
और दूर तलक भगाती है मुझे
आखिर थक के बैठता हूँ और पाता हुँ खुद को
एक नई जगह नए अहसासों के साथ
वो चाहती है कविता अपने लिए मेरे अहसासों से
कोशिश करता हूँ पर नहीं छू पाता उसे
और रह जाती है कविता अधूरी.............